Skip to main content

Posts

फायर स्टेशन है नही और पार्क के नाम 25 करोड़

भइया छतरपुर के प्रशासन और नेता भी गजब है। जब प्रदेश में कोई घटना हो जाती है उसके बाद हमारे यहां आदेश आता है कि व्यवस्थायें दुरूस्त करना सुनिश्चित करें। आज से पहले तक कोई व्यवस्था सुदृण हुई हो ऐसा मुझे छतरपुर के नागरिक होंते हुए पता नही, बस 1 महीने व्यवस्थायें दुरुस्त करने की कागजी कार्यवाही शुरू हो जाती है और महीने भर में लेन देन द्वारा कागज पर दुरुस्ती की रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी जाती है।  किसी भी जन प्रतिनिधि को ये नही लगता कि छतरपुर का विकास हो। बस बड़े नेता का स्वागत करवा लो। अभी अपने शहर में अच्छा फायर स्टेशन तक नही है। पार्क के नाम पर 25 करोड़ खर्च कर सकते है लेकिन 5 फायर फाइटिंग गाड़ियां नही खरीद सकते, जो कम से कम शहर और आस पास के इलाकों के लिए हर वर्ष होने वाली आगजनी की घटनाएँ रोकने में काम आए।  भइया अपनो छतरपुर हमें बढिया बनाने आय। जय राम जी की।
Recent posts

उपेक्षित बुंदेलखंड

बुंदेलखंड के कई राष्ट्रीय स्तर के जन प्रतिनिधि इस देश को दिए है लेकिन आज तक किसी ने भी इसके डेवलोपमेन्ट के बारे में नही सोचा। बस अपनी जेबे भरना यहां के जन प्रतिनिधियों की पहली प्राथमिकता है। बात छतरपुर की करे तो 

व्यवसाय स्थापना, संस्थान की संरचना एवं कार्यप्रणाली

भारत में संस्थानों की संरचना जो कि एक सफलतम इकाई के रूप में स्थापित हो ऐसी ही कार्यप्रणाली की आज में बात करने जा रहा हूँ. बात की शुरुआत मै इस तर्क के साथ करने जा रहा हूँ कि हमारे भारतीय व्यवसायिक संस्थानों जो कि आम और सामान्य विचारो की उपज की देन से खोली जाती है उनके बाज़ार परिद्रश्य में सफल होने की संभावनाएं समय के साथ क्षीण पड़ती जाती है क्योकि उनके साथ गणनाओं का आभाव होता है और त्वरित परिस्थितियों के अनुसार स्थापित की जाती है जो कुछ समय के बाद क्षीण पड़ने लगती है और अंततः समाप्ति की ओर चल देती है. इन्ही सभी बातों को ध्यान मे रखते हुए कुछ जानकारियाँ साझा कर रहा हूँ कि कैसे आप अपनी संस्था को सुदृढ़ और सफल बनावे. व्यवसायक संस्था की उत्पत्ति के पीछे जो प्रमुख करक काम करता है वो है “विचार”. विचार जिसे हम IDEA भी कहते है उसका होना जरूरी है नाकि किसी और के काम की कॉपी करना कि फलां आदमी तो उस काम से अच्छा कमा रहा है क्यों न मै भी वही काम करके वैसे ही मुनाफा कमाऊ तो यहाँ मेरा कहना है कि विचार पर काम व्यक्ति अपनी परिस्थियों के अनुसार करता है तो जरूरी नहीं कि उसका विचार के अनुसार किया गया काम ...

सफेद दाग भ्रम और सच्चाई

सफेद दाग को लेकर लोगों के मन में तरह-तरह की गलत धारणाएं हैं। सचाई यह है कि हमें-आपको यह बेशक कोई बीमारी लगती हो, डॉक्टरों की निगाह में महज कॉस्मेटिक प्रॉब्लम है। ऐसे में आप अपने मन से दाग निकालिए क्योंकि सफेद दाग वाला शख्स पूरी तरह नॉर्मल है। क्या है सफेद दाग? -एक ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है। ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) उलटा असर यानी शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगती है। -सफेद दाग के मामले में खराब इम्यूनिटी की वजह से शरीर में स्किन का रंग बनाने वाली कोशिकाएं मेलानोसाइट(melanocyte)मरने लगती हैं। इससे शरीर में जगह-जगह उजले धब्बे बन जाते हैं। -सफेद दाग को वीटिलिगो, ल्यूकोडर्मा, फुलेरी और श्वेत पात नाम से भी जाना जाता है। कितने तरह के सफेद दाग शरीर में फैलाव के आधार पर सफेद दाग को नीचे लिखी कैटगरी में बांटा जा सकता है: -लिप-टिप: होठों और हाथों के ऊपर -फोकल: शरीर में एक-दो जगह पर छोटे-छोटे सफेद दाग -सेग्मेंटल: एक पूरे हिस्से में, मिसाल के लिए पूरे हाथ या पांव में सफेद दाग होना -जनरलाइज्ड: शरीर के कई हिस्सों में सफेद दाग का फैलना क्या हैं लक्षण? -जब स...

अच्छे दिन आने वाले है?

विशाल वहुमत के साथ NDA और भाजपा ने अपने विरोधियों को नेस्ताबूत कर दिया. और जनता के बीच एक नया उन्माद पैदा हो गया है एक आशा सभी के मन में जाग गई कि अब शायद “अच्छे दिन आने वाले है”, लेकिन ये अच्छे दिन किस रूप में आयेंगे? क्या भारत एकदम से सुपरपॉवर बन जायेगा? महंगाई खत्म हो जाएगी? बेरोजगारों को रोजगार मिल जायेगा? किसानो का भला हो  जायेगा? इन सवालो को हम रोज न्यूज़ चैनलों पर बहस के रूप में देख रहे है. कई न्यूज़ चैनलों ने तो गणनाएं करके भविष्यबाणी भी कर दी है कि सरकार क्या-क्या और कैसे काम करेगी. लेकिन इन सब के बीच एक बात तो स्पष्ठ है कि कुछ तो बदलाव दिख रहा है. बात करे भारतीय बाज़ार कि तो संवेदी सूचकांक में चुनाव परिणाम के बाद से एकदम उछाल देखने को मिल रहा है. निवेशक भी लौट कर आ रहे है. कई बड़ी कंपनियों ने तो भारी निवेश कि मंशा भी जता दी है. सोने में भी गिरावट देखने को मिल रही है. बाज़ार में सब्जियां भी स्थिर और कम दाम पर मिल रही है. रियल एस्टेट मार्किट भी गिरावट कि जगह स्थिर सा लग रहा है लोग दोबारा से निवेश में रूचि ले रहे है. इन कुछ परिस्थतियों को देखकर तो लगता है कि कुछ भरोसा बाज़ार में...

गरीब कि आँखों में अमीरों का सपना

ब ड़ा सा चमचमाता मंच, चारो ओर कैमरों की नज़रे, चन्द भद्र दर्शक, दुनियां के बड़े बड़े अभिनेता, दुनियां भर के टीवी दर्शक और उन सबके बीच बैठा एक गरीब जिसने अपने सपने में भी ऐसी जगह नहीं देखी. ये मंज़र है कलर टीवी पर प्रकाशित नए रियलिटी शो “सपने” का. आज के भारतीय समाज में कुछ भी व्यवसाय किया जा सकता है फूहड़ता और हकीकतो से दूर टीवी सीरियल वालो को अब गरीबी से भी पैसे कमाने का रामबाण तरीका मिल गया है. चंद पैसो की मदद के एवज में करोडो का कारोबार करने की जुगत में आज टीवी चैनल वाले दर्जनों प्रोग्राम बना रहे है. जिसमे गरीब की गरीबी बेचीं जा रही है. टीवी वालो को चाहिए TRP और अधिक से अधिक विज्ञापन, कलाकार/अभिनेता को चाहिए कि उनका प्रमोशन हो सके, दर्शको को चाहिए कि कोई बढ़िया भावनात्मक कार्यक्रम देखने को मिले, बस क्या था एक गरीब को पकड़ा और चालू हो गया सबकी मनोकामनाओ को पूरा करने का कार्यक्रम. प्रति 10 सेकंड विज्ञापन के 1 लाख लेने वाले टीवी चैनल गरीब की दिन भर की कमाई का 100 गुना करके देते है. 200 रुपये प्रति दिन की चाय बेचने वालो के स्थान पर एक बड़ा अभिनेता/कलाकार उस गरीब के स्थान पर एक दिन उसका काम करत...

"भारत रत्न" सचिन की जगह ध्यानचंद को मिलना चाहिए था.

आज का नया मुद्दा "भारत रत्न" सचिन की जगह ध्यानचंद को मिलना चाहिए था. अब सचिन को मिला तो इसमें क्या दोष? ध्यानचंद को तो बीते 60 साल में नहीं दे पाए, और अब ये चर्चा गरम होने लगी है की सचिन से पहले ध्यानचंद को मिलना चाहिए था, अरे ओ मिडिया में बकलोली करने बाले लोंगो 60 साल से क्या आपको सांप सूंघ गया था? आज हॉकी एसोसिएसन की इक्छा शक्ति को देखकर ऐसा लगता है अगर ध्यानचंद जी फिर से जन्म लेकर हॉकी खेलेंगे तब भी कोई उन्हें पूछने बाला नहीं रहेगा केबल किताबो और बातो में सीमित होकर रह जायेंगे. एक तो सरकार हॉकी को राष्ट्रीय खेल घोषित किये हुए है लेकिन उसके उत्थान में केवल खाना-पूर्ति होती है. और ऐसी बात नहीं है की हॉकी की ऐसी स्थिति है अगर क्रिकेट भी शासकीय खेल होता इसकी स्थिति भी हॉकी से भिन्न न होती. भला हो उस फिल्म "चक दे इंडिया" और उस "इंडियन हॉकी लीग" का जिसने हॉकी से आम जनता का रूबरू मिलन करवाया, वर्ना सरकार ने तो इस खेल को नेस्तनाबूत करने की कसम ही खा रखी थी. आखिर में ध्यानचंद जी को किसी सरकारी तमगे की जरूरत नहीं है, वो शख्सियत ही इतनी बड़ी है ...