आज का नया मुद्दा "भारत रत्न" सचिन की जगह ध्यानचंद को मिलना चाहिए था. अब सचिन को मिला तो इसमें क्या दोष? ध्यानचंद को तो बीते 60 साल में नहीं दे पाए, और अब ये चर्चा गरम होने लगी है की सचिन से पहले ध्यानचंद को मिलना चाहिए था, अरे ओ मिडिया में बकलोली करने बाले लोंगो 60 साल से क्या आपको सांप सूंघ गया था? आज हॉकी एसोसिएसन की इक्छा शक्ति को देखकर ऐसा लगता है अगर ध्यानचंद जी फिर से जन्म लेकर हॉकी खेलेंगे तब भी कोई उन्हें पूछने बाला नहीं रहेगा केबल किताबो और बातो में सीमित होकर रह जायेंगे. एक तो सरकार हॉकी को राष्ट्रीय खेल घोषित किये हुए है लेकिन उसके उत्थान में केवल खाना-पूर्ति होती है. और ऐसी बात नहीं है की हॉकी की ऐसी स्थिति है अगर क्रिकेट भी शासकीय खेल होता इसकी स्थिति भी हॉकी से भिन्न न होती. भला हो उस फिल्म "चक दे इंडिया" और उस "इंडियन हॉकी लीग" का जिसने हॉकी से आम जनता का रूबरू मिलन करवाया, वर्ना सरकार ने तो इस खेल को नेस्तनाबूत करने की कसम ही खा रखी थी. आखिर में ध्यानचंद जी को किसी सरकारी तमगे की जरूरत नहीं है, वो शख्सियत ही इतनी बड़ी है ...
मुद्दा ब्लॉग समाज में व्याप्त समस्याओं को उठाना है.