विशाल वहुमत के साथ NDA और भाजपा ने अपने विरोधियों को नेस्ताबूत कर दिया. और जनता के बीच एक नया उन्माद पैदा हो गया है एक आशा सभी के मन में जाग गई कि अब शायद “अच्छे दिन आने वाले है”, लेकिन ये अच्छे दिन किस रूप में आयेंगे? क्या भारत एकदम से सुपरपॉवर बन जायेगा? महंगाई खत्म हो जाएगी? बेरोजगारों को रोजगार मिल जायेगा? किसानो का भला हो जायेगा? इन सवालो को हम रोज न्यूज़ चैनलों पर बहस के रूप में देख रहे है. कई न्यूज़ चैनलों ने तो गणनाएं करके भविष्यबाणी भी कर दी है कि सरकार क्या-क्या और कैसे काम करेगी.लेकिन इन सब के बीच एक बात तो स्पष्ठ है कि कुछ तो बदलाव दिख रहा है. बात करे भारतीय बाज़ार कि तो संवेदी सूचकांक में चुनाव परिणाम के बाद से एकदम उछाल देखने को मिल रहा है. निवेशक भी लौट कर आ रहे है. कई बड़ी कंपनियों ने तो भारी निवेश कि मंशा भी जता दी है. सोने में भी गिरावट देखने को मिल रही है. बाज़ार में सब्जियां भी स्थिर और कम दाम पर मिल रही है. रियल एस्टेट मार्किट भी गिरावट कि जगह स्थिर सा लग रहा है लोग दोबारा से निवेश में रूचि ले रहे है. इन कुछ परिस्थतियों को देखकर तो लगता है कि कुछ भरोसा बाज़ार में लौट रहा है वो भी अभी सरकार बनने के पहले तो मेरे हिशाब से मोदी सरकार को इन काँटों भरे रास्ते में कुछ तो सहूलियत मिलेगी. क्योकि जनता का भरोसा अगर सरकार पर बन रहा है तो सरकार भी स्थिर मन से काम करेगी.
ये तो बाते है व्यवसाय और भारतीय पूंजी बाज़ार से सम्बंधित जहाँ अच्छे दिनों जैसा माहौल बन रहा है, लेकिन बात करे भारतीय राजनीतिक दलों कि तो इस विशाल जीत के साथ जहाँ भाजपा और NDA का मनोबल बड़ा हुआ है वहीँ प्रमुख विपक्षी दल तो आत्मसम्मान बचाने की जद्दोजहद से जूझ रहा है, इस वक़्त कांग्रेस के पास इतने सांसद भी नहीं है कि जो एक विपक्ष का निर्माण कर सके. विपक्ष बनाने के लिए उसे जोड़-तोड़ करनी पड़ रही है. 2009 के चुनाव के समय 214 सीटे जीतने वाली कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमट कर रह जाएगी इसका अनुमान तो भाजपा को भी नहीं था. लेकिन इतने बड़े नुकशान कि वजह क्या थी? मेरे हिशाब से तो जो कांग्रेस विरोधी लहर देश में चल रही थी उसी कारण सर्वाधिक नुकशान हुआ इसके बाद एक कमज़ोर प्रधान मंत्री (कमज़ोर इसलिए मानता हूँ क्योकि आप कितने भी गुणी क्यों न हो अगर execution कि क्षमता आप में नहीं तो आप का ज्ञान किसी काम का नहीं है). तीसरी बात अपने घोटालेवाज मंत्रियो पर कोई कार्यवाही न करना और चौथी जो मेरे हिशाब से महत्वपूर्ण है कि एक ही परिवार (गाँधी परिवार) कि जी हुजूरी में लगे रहना. क्या इतनी बड़ी कांग्रेस में कोई नेता नहीं बचा? सब एक ही घंटा बजाते रहते है?
कुछ दिन पहले माँ बेटा ने चुनाव में हार कि जिम्मेदारी लेकर formalities पूरी कर दी और अपने –अपने स्तीफो कि पेसकस कर दी जिसे सभी कांग्रेसियों ने यह कहकर नामंजूर कर दिया कि आप ही तो हमारे माई-बाप हो आप नहीं रहोगे तो हम सब तो बेघर हो जायेंगे. अरे लानत है ऐसी पार्टी पर जिसमे इतनी चाटुकारिता भरी है. होना ये चाहिए था कि हार पर गंभीरता से समीक्षा होती और जिम्मेवारी परिवर्तन होती. संगठन को नए उर्जावान व्यक्ति को सौपते और आगे के लिए तैयारी करते. लेकिन अब मुझे नहीं लगता कि ये पार्टी अपने सिधान्तो में बदलाव किये बिना 10-15 साल दोबारा सरकार में आ पायेगी.
अभी कुछ ही महीनो में कुछ प्रदेशो में विधानसभा चुनाव है तब शायद इनको अपनी स्थिति का अनुमान लग जायेगा कि अगर बदलाव नहीं किया तो “अच्छे दिन आने के लिए इंतज़ार बड जायेगा”. क्योकि अभी तो अच्छे दिन किसी और के चल रहे है.
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