भारत में संस्थानों की संरचना जो कि एक सफलतम इकाई के रूप में स्थापित हो ऐसी ही कार्यप्रणाली की आज में बात करने जा रहा हूँ. बात की शुरुआत मै इस तर्क के साथ करने जा रहा हूँ कि हमारे भारतीय व्यवसायिक संस्थानों जो कि आम और सामान्य विचारो की उपज की देन से खोली जाती है उनके बाज़ार परिद्रश्य में सफल होने की संभावनाएं समय के साथ क्षीण पड़ती जाती है क्योकि उनके साथ गणनाओं का आभाव होता है और त्वरित परिस्थितियों के अनुसार स्थापित की जाती है जो कुछ समय के बाद क्षीण पड़ने लगती है और अंततः समाप्ति की ओर चल देती है.
इन्ही सभी बातों को ध्यान मे रखते हुए कुछ जानकारियाँ साझा कर रहा हूँ कि कैसे आप अपनी संस्था को सुदृढ़ और सफल बनावे.
व्यवसायक संस्था की उत्पत्ति के पीछे जो प्रमुख करक काम करता है वो है “विचार”. विचार जिसे हम IDEA भी कहते है उसका होना जरूरी है नाकि किसी और के काम की कॉपी करना कि फलां आदमी तो उस काम से अच्छा कमा रहा है क्यों न मै भी वही काम करके वैसे ही मुनाफा कमाऊ तो यहाँ मेरा कहना है कि विचार पर काम व्यक्ति अपनी परिस्थियों के अनुसार करता है तो जरूरी नहीं कि उसका विचार के अनुसार किया गया काम आपके लिए भी मुनाफेदार साबित हो. प्रमुख बात अगर आपके पास स्वयं का विचार नहीं है तो परंपरागत व्यवसाय को चुनें जो कि पहले से जांचा परखा हो और उसके सभी आंकडे उपलब्ध हो.
दूसरा कारक जो महत्वपूर्ण है वो है “मांग”. मांग की बात करे तो जो व्यवसाय आपने चुना है उसकी क्या बाज़ार में मांग है? यह देखना महत्वपूर्ण है कि बिना बाज़ार की मांग के आप कोई भी उत्पाद नहीं बेच सकते है. अतः मांग अनुसार उत्पाद का चुनाव भी जरूरी है. हाँ यदि आपके पास कोई कांसेप्ट उत्पाद है तो जरूर उसकी रूप रेखा बना के यह देख ले कि क्या आपके उत्पाद की बाज़ार में मांग बनाई जा सकती है.
तीसरा प्रमुख कारक है “कार्यप्रणाली”. किसी संस्थान की स्थापना का प्रमुख कारक कार्यप्रणाली है जो कि संस्थान के ढांचे, उत्पादन, विपणन/वितरण, मुनाफे एवं विस्तार को देखते हुए बनायी जाती है. किसी भी संस्थान की संरचना बिना सही कार्यप्रणाली के सही काम नहीं कर सकती है और अगर ऐसा होता भी है या कुछ कमियां रह भी जाती है तो संस्थान को उत्पादन से लेकर व्यवस्था में भारी नुकसान उठाना पड़ता है. अतः एक सुदृढ़ कार्यप्रणाली बना के ही संस्था का परिचालन करे.
चौथा कारक है “जिम्मेदारियां/जबाबदेही”. संस्थान में सही व्यक्ति का चुनाव और उस व्यक्ति को दी गई जिम्मेदारियां बहुँत ही महत्वपूर्ण कारक है. केवल काम चलने के लिए कम तनख्वाह वाला व्यक्ति चुन लेना समझदारी नहीं है सही व्यक्ति संबंधित काम के लिए चुनना ज्यादा महत्वपूर्ण है चाहे उसे आपको ज्यादा तनख्वाह क्यों न देनी पड़े. सही व्यक्ति के चुनाव न होने पर संस्था स्वामी और सहकर्मचारियों के ऊपर अतिरिक्त भार पड़ जाता है जिससे प्रबंधन, उत्पादन एवं विपणन में समस्या आ सकती है. अतः पहले से ही सुनिश्चित करके ही व्यक्ति एवं जिम्मेदारियों को वितरित करे.
पांचवां कारक “गुणवत्ता” जो की उत्पाद का प्रमुख कारक है. भले ही आप निम्न स्तर उत्पाद को चुने लेकिन गुणवत्ता आपके उत्पाद का भविष्य निर्धारित करता है अगर गुणवत्ता से समझौता किया गया तो आप लागत तो कम कर सकते है लेकिन बाज़ार में उसका जीवनकाल कम कर देंगे और ग्राहक की शिकायतों से अलग सामना करेंगे. और ऐसा भी नहीं कि उत्पाद कि लागत को बहुत बढ़ा ले जिससे आपका मुनाफा भी उत्पादन की भेंट चढ़ जाये. इसलिए मानको के अनुसार उत्पाद का उत्पादन हो और वो भी गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए. क्योकि ग्राहक का भरोसा ही आपके उत्पाद के लिए भविष्य निर्धारित करेगा कि वो चलेगा या नहीं.
छटा कारक “पूंजीगत लागत” जो शायद हर व्यवसाय की रीढ़ है हमेशा परिस्थितियों और बाज़ार के हिसाब से आपको व्यवसाय लागत तय करनी चाहिए और आसान उपलब्ध पूंजी से ही व्यवसाय को स्थापित करना चाहिए. एक बात को मन में गांठ बंधकर रख लेनी चाहिए की व्यवसाय स्थापना के 6 माह और व्यवसाय की प्रक्रति के अनुसार ज्यादा भी माह तक हमें संरक्षित पूंजी रखनी चाहिए. इसका मतलब कि व्यवसाय स्थापना में हुए कुल खर्च और उत्पादन में प्रति माह आने वाली लागत. (प्रति माह उत्पाद की लागत को ही 6 या उससे अधिक माह समय तक अपनी मुख्य पूंजीगत लागत से ही खर्च करना चाहिए, ऐसा करना हमें ज्यादा फायेदेमंद होता है). और कभी भी व्यवसाय की पूंजी को किसी अन्य कार्य में नहीं लगाना चाहिए.
अन्य प्रमुख कारको में से है उत्पाद संवर्धन (ब्रांड प्रमोशन), विपणन (मार्केटिंग), विक्रय (सेल्स), मुनाफा (प्रॉफिट) एवं व्यापार विस्तार (बिज़नस एक्सपेंशन).
उत्पाद संवर्धन (ब्रांड प्रमोशन):
व्यवसाय चाहे सेवा (सर्विस) क्षेत्र में हो या उत्पादन (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र में उत्पाद का प्रमोशन अत्यंत की आवश्यक कारक है संस्था अपने बज़ट के अनुसार अपने उत्पाद का सही दिशा में प्रमोशन करे क्योकि अपने ग्राहकों तक पहूँचने से पहले आपको अपने ग्राहकों तक अपने उत्पाद की सूचना पहुंचानी अति आवश्यक है. आकर्षक प्रमोशन आपके ग्राहकों के मन में उत्पाद को लेकर उत्सुकता पैदा करता है जिस कारण से आपके उत्पाद को बाज़ार में अच्छी पकड़ मिलती है. अतः आज के समय के अनुसार प्रमोशन के सभी माध्यमो का उपयोग आपको करना चाहिए जैसे की इन्टरनेट पर ऑनलाइन प्रमोशन, मीडिया प्रमोशन, सोशल मीडिया प्रमोशन, फिजिकल प्रमोशन जैसे की होर्डिंग्स, बैनर आदि. वर्तमान में सोशल मीडिया प्रमोशन एक अच्छा जरिया है अपने उत्पाद को प्रमोट करने का क्योकि ये अत्यधिक सस्ता या मुफ्त है और इसकी पहुँच भी आज घर-घर में है.
मार्केटिंग एवं सेल्स को बढ़ावा देने में उत्पाद प्रदर्शित करना भी बहुत ही अहम कारक है जितना अच्छा प्रदर्शन उतना प्रभावी परिणाम हमें सेल्स में मिलेगा. मार्केटिंग और सेल्स को भी उचित तकनीकी एवं अनुभवी सेल्स कर्मचारियों द्वारा किया जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि सेल्स का व्यक्ति ही आपके उत्पाद का प्रदर्शन ग्राहकों के बीच करता है और यदि प्रदर्शन में कोई त्रुटी हुई तो संस्था और उत्पाद की छवि पर बात आती है इसलिए इनका चुनाव बहुत ही सोच समझ के करना चाहिए.
मुनाफा हर उत्पादन और संस्थान का एक मात्र उद्देश्य होता है तो इस कारक पर बहुत ही सावधानी से कार्य करना चाहिए. मुनाफे का आंकलन सम्पूर्ण लागत और ग्राहक की क्षमता के अनुसार करना बहुत ही जरूरी है. शुरूआती दौर में मुनाफे की जगह आपको अपने उत्पाद की गुणवत्ता पर घ्यान केन्द्रित करना चाहिए. और इतना कम मुनाफा भी नहीं आंकना चाहिए कि उत्पादन लागत समय के साथ आप पर बोझ बनने लगे. सभी तथ्यों के मूल्यांकन के बाद और उत्पादन लागत के अनुसार अपने उत्पाद का मूल्य मुनाफे के साथ तय करना चाहिए.
व्यापार विस्तार (बिज़नस एक्सपेंशन): हमने अधिकांश तौर पर देखा है कि लोग व्यापार तो स्थापित कर लेते है परन्तु उसके विस्तार के बारे में नहीं सोचते. उनका हमेशा से ये मानना होता है कि जैसे-जैसे मुनाफा कमाएंगे विस्तार अपने आप होता जायेगा. लेकिन सही मायने में और आज की परिस्थियों को देखते हुए हमें अपने व्यापार विस्तारण की कार्यप्रणाली और प्लान पहले से ही बना के रख लेने चाहिए जिससे नियत समय में आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करते रहेंगे और प्रारंभिक पूंजी से स्थापित व्यवसाय को बिना अतिरिक्त व्यय के विस्तार कर पाएंगे.
इस लेख में मैंने कुछ जानकारियां आपसे साझा की है उम्मीद करता हूँ की आप सभी जो अपने व्यापार को स्थापित करना चाहते है मदद मिलेगी.
डॉ. सुरेन्द्र सिंह राजपूत
इन्ही सभी बातों को ध्यान मे रखते हुए कुछ जानकारियाँ साझा कर रहा हूँ कि कैसे आप अपनी संस्था को सुदृढ़ और सफल बनावे.
व्यवसायक संस्था की उत्पत्ति के पीछे जो प्रमुख करक काम करता है वो है “विचार”. विचार जिसे हम IDEA भी कहते है उसका होना जरूरी है नाकि किसी और के काम की कॉपी करना कि फलां आदमी तो उस काम से अच्छा कमा रहा है क्यों न मै भी वही काम करके वैसे ही मुनाफा कमाऊ तो यहाँ मेरा कहना है कि विचार पर काम व्यक्ति अपनी परिस्थियों के अनुसार करता है तो जरूरी नहीं कि उसका विचार के अनुसार किया गया काम आपके लिए भी मुनाफेदार साबित हो. प्रमुख बात अगर आपके पास स्वयं का विचार नहीं है तो परंपरागत व्यवसाय को चुनें जो कि पहले से जांचा परखा हो और उसके सभी आंकडे उपलब्ध हो.
दूसरा कारक जो महत्वपूर्ण है वो है “मांग”. मांग की बात करे तो जो व्यवसाय आपने चुना है उसकी क्या बाज़ार में मांग है? यह देखना महत्वपूर्ण है कि बिना बाज़ार की मांग के आप कोई भी उत्पाद नहीं बेच सकते है. अतः मांग अनुसार उत्पाद का चुनाव भी जरूरी है. हाँ यदि आपके पास कोई कांसेप्ट उत्पाद है तो जरूर उसकी रूप रेखा बना के यह देख ले कि क्या आपके उत्पाद की बाज़ार में मांग बनाई जा सकती है.
तीसरा प्रमुख कारक है “कार्यप्रणाली”. किसी संस्थान की स्थापना का प्रमुख कारक कार्यप्रणाली है जो कि संस्थान के ढांचे, उत्पादन, विपणन/वितरण, मुनाफे एवं विस्तार को देखते हुए बनायी जाती है. किसी भी संस्थान की संरचना बिना सही कार्यप्रणाली के सही काम नहीं कर सकती है और अगर ऐसा होता भी है या कुछ कमियां रह भी जाती है तो संस्थान को उत्पादन से लेकर व्यवस्था में भारी नुकसान उठाना पड़ता है. अतः एक सुदृढ़ कार्यप्रणाली बना के ही संस्था का परिचालन करे.
चौथा कारक है “जिम्मेदारियां/जबाबदेही”. संस्थान में सही व्यक्ति का चुनाव और उस व्यक्ति को दी गई जिम्मेदारियां बहुँत ही महत्वपूर्ण कारक है. केवल काम चलने के लिए कम तनख्वाह वाला व्यक्ति चुन लेना समझदारी नहीं है सही व्यक्ति संबंधित काम के लिए चुनना ज्यादा महत्वपूर्ण है चाहे उसे आपको ज्यादा तनख्वाह क्यों न देनी पड़े. सही व्यक्ति के चुनाव न होने पर संस्था स्वामी और सहकर्मचारियों के ऊपर अतिरिक्त भार पड़ जाता है जिससे प्रबंधन, उत्पादन एवं विपणन में समस्या आ सकती है. अतः पहले से ही सुनिश्चित करके ही व्यक्ति एवं जिम्मेदारियों को वितरित करे.
पांचवां कारक “गुणवत्ता” जो की उत्पाद का प्रमुख कारक है. भले ही आप निम्न स्तर उत्पाद को चुने लेकिन गुणवत्ता आपके उत्पाद का भविष्य निर्धारित करता है अगर गुणवत्ता से समझौता किया गया तो आप लागत तो कम कर सकते है लेकिन बाज़ार में उसका जीवनकाल कम कर देंगे और ग्राहक की शिकायतों से अलग सामना करेंगे. और ऐसा भी नहीं कि उत्पाद कि लागत को बहुत बढ़ा ले जिससे आपका मुनाफा भी उत्पादन की भेंट चढ़ जाये. इसलिए मानको के अनुसार उत्पाद का उत्पादन हो और वो भी गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए. क्योकि ग्राहक का भरोसा ही आपके उत्पाद के लिए भविष्य निर्धारित करेगा कि वो चलेगा या नहीं.
छटा कारक “पूंजीगत लागत” जो शायद हर व्यवसाय की रीढ़ है हमेशा परिस्थितियों और बाज़ार के हिसाब से आपको व्यवसाय लागत तय करनी चाहिए और आसान उपलब्ध पूंजी से ही व्यवसाय को स्थापित करना चाहिए. एक बात को मन में गांठ बंधकर रख लेनी चाहिए की व्यवसाय स्थापना के 6 माह और व्यवसाय की प्रक्रति के अनुसार ज्यादा भी माह तक हमें संरक्षित पूंजी रखनी चाहिए. इसका मतलब कि व्यवसाय स्थापना में हुए कुल खर्च और उत्पादन में प्रति माह आने वाली लागत. (प्रति माह उत्पाद की लागत को ही 6 या उससे अधिक माह समय तक अपनी मुख्य पूंजीगत लागत से ही खर्च करना चाहिए, ऐसा करना हमें ज्यादा फायेदेमंद होता है). और कभी भी व्यवसाय की पूंजी को किसी अन्य कार्य में नहीं लगाना चाहिए.
अन्य प्रमुख कारको में से है उत्पाद संवर्धन (ब्रांड प्रमोशन), विपणन (मार्केटिंग), विक्रय (सेल्स), मुनाफा (प्रॉफिट) एवं व्यापार विस्तार (बिज़नस एक्सपेंशन).
उत्पाद संवर्धन (ब्रांड प्रमोशन):
व्यवसाय चाहे सेवा (सर्विस) क्षेत्र में हो या उत्पादन (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र में उत्पाद का प्रमोशन अत्यंत की आवश्यक कारक है संस्था अपने बज़ट के अनुसार अपने उत्पाद का सही दिशा में प्रमोशन करे क्योकि अपने ग्राहकों तक पहूँचने से पहले आपको अपने ग्राहकों तक अपने उत्पाद की सूचना पहुंचानी अति आवश्यक है. आकर्षक प्रमोशन आपके ग्राहकों के मन में उत्पाद को लेकर उत्सुकता पैदा करता है जिस कारण से आपके उत्पाद को बाज़ार में अच्छी पकड़ मिलती है. अतः आज के समय के अनुसार प्रमोशन के सभी माध्यमो का उपयोग आपको करना चाहिए जैसे की इन्टरनेट पर ऑनलाइन प्रमोशन, मीडिया प्रमोशन, सोशल मीडिया प्रमोशन, फिजिकल प्रमोशन जैसे की होर्डिंग्स, बैनर आदि. वर्तमान में सोशल मीडिया प्रमोशन एक अच्छा जरिया है अपने उत्पाद को प्रमोट करने का क्योकि ये अत्यधिक सस्ता या मुफ्त है और इसकी पहुँच भी आज घर-घर में है.
मार्केटिंग एवं सेल्स को बढ़ावा देने में उत्पाद प्रदर्शित करना भी बहुत ही अहम कारक है जितना अच्छा प्रदर्शन उतना प्रभावी परिणाम हमें सेल्स में मिलेगा. मार्केटिंग और सेल्स को भी उचित तकनीकी एवं अनुभवी सेल्स कर्मचारियों द्वारा किया जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योकि सेल्स का व्यक्ति ही आपके उत्पाद का प्रदर्शन ग्राहकों के बीच करता है और यदि प्रदर्शन में कोई त्रुटी हुई तो संस्था और उत्पाद की छवि पर बात आती है इसलिए इनका चुनाव बहुत ही सोच समझ के करना चाहिए.
मुनाफा हर उत्पादन और संस्थान का एक मात्र उद्देश्य होता है तो इस कारक पर बहुत ही सावधानी से कार्य करना चाहिए. मुनाफे का आंकलन सम्पूर्ण लागत और ग्राहक की क्षमता के अनुसार करना बहुत ही जरूरी है. शुरूआती दौर में मुनाफे की जगह आपको अपने उत्पाद की गुणवत्ता पर घ्यान केन्द्रित करना चाहिए. और इतना कम मुनाफा भी नहीं आंकना चाहिए कि उत्पादन लागत समय के साथ आप पर बोझ बनने लगे. सभी तथ्यों के मूल्यांकन के बाद और उत्पादन लागत के अनुसार अपने उत्पाद का मूल्य मुनाफे के साथ तय करना चाहिए.
व्यापार विस्तार (बिज़नस एक्सपेंशन): हमने अधिकांश तौर पर देखा है कि लोग व्यापार तो स्थापित कर लेते है परन्तु उसके विस्तार के बारे में नहीं सोचते. उनका हमेशा से ये मानना होता है कि जैसे-जैसे मुनाफा कमाएंगे विस्तार अपने आप होता जायेगा. लेकिन सही मायने में और आज की परिस्थियों को देखते हुए हमें अपने व्यापार विस्तारण की कार्यप्रणाली और प्लान पहले से ही बना के रख लेने चाहिए जिससे नियत समय में आप अपने लक्ष्य को प्राप्त करते रहेंगे और प्रारंभिक पूंजी से स्थापित व्यवसाय को बिना अतिरिक्त व्यय के विस्तार कर पाएंगे.
इस लेख में मैंने कुछ जानकारियां आपसे साझा की है उम्मीद करता हूँ की आप सभी जो अपने व्यापार को स्थापित करना चाहते है मदद मिलेगी.
डॉ. सुरेन्द्र सिंह राजपूत

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